Sarojini Naidu hindi

Sarojini Naidu hindi | Sarojini Naidu

Introduction

सरोजिनी नायडू का जीवन परिचय

हम भारतवासी प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी के दिन राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं यह दिवस हम कवित्री सरोजिनी नायडू की स्मृति में मनाते हैं। सरोजिनी नायडू प्रसिद्ध कवित्री थी और उन्होंने कई कविताओं का सृजन किया था, इसलिए उन्हें भारत की कोकिला या भारत की बुलबुल कहते हैं।

जन्म

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था । इनके पिता का नाम अघोरनाथ चट्टोपाध्याय और माता का नाम सुंदरा देवी चट्टोपाध्याय था। इनके पिता एक सुप्रसिद्ध विद्वान थे और माता एक बांग्ला कवित्री थी। बाल्यकाल से ही सरोजिनी नायडू की कविता लिखने में रुचि थी और यह विद्यालय में भी हमेशा प्रवीण सूची में आती थी।

प्रारंभिक जीवन

कुशाग्र बुद्धि वाली सरोजिनी नायडू ने मात्र 12 वर्ष की आयु में मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली और उनके पिता ने उन्हें आगे का अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड भेज दिया वहां उन्होंने लंदन के किंग्स कॉलेज और तत्पश्चात उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में भी अध्ययन किया। साहित्य में रुचि रखने सरोजिनी नायडू ने मात्र 13 वर्ष की आयु में ही एक कविता की रचना की जिसका शीर्षक था,  लेडी ऑफ दी लेक । मात्र 11 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह डॉक्टर गोविंदराजुलु नायडू के साथ हुआ था।

रचनाएं

बाल्यकाल से ही साहित्य में रुचि रखने वाली सरोजिनी नायडू ने अपने जीवन में कई कविताओं की रचना की और कविता संग्रह लिखे उनका प्रथम कविता संग्रह गोल्डन थ्रेसोल्ड था। उनके दूसरे और तीसरे कविता संग्रह द बर्ड ऑफ टाइम , द ब्रोकन विंग ने उन्हें विश्व प्रसिद्ध बना दिया। उनकी अन्य रचनाओं में शामिल है नीलाम और द ट्रेवल्स सॉन्ग।

स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू

एक महान कवित्री की तरह सरोजिनी नायडू एक महान स्वतंत्रता सेनानी भी थी। एक बार वर्ष 1902 में उन्होंने राष्ट्र को संबोधित करते हुए भाषण दिया उस भाषण को सुनने वालों में स्वतंत्रता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले भी शामिल थे। भाषण को सुनने के बाद में और सरोजिनी नायडू के प्रगतिशील विचारों को देखते हुए गोखले ने उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए कहा। इसके बाद वह राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हुई

और इसी क्रम में उनकी मुलाकात सन 1914 में महात्मा गांधी से लंदन में हुई महात्मा गांधी से मिलने के बाद वे कांग्रेश की एक प्रवक्ता बन गई और महात्मा गांधी के साथ कदम से कदम मिलाकर स्वतंत्रता के लिए आगे बढ़ती रही।

सरोजनी नायडू ने 1925 में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की अध्यक्षता की । इसके अतिरिक्त उन्होंने कागज की कई समितियों के अंतर्गत कार्य किया और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशभर में जगह जगह पर जाकर लोगों को जागरूक किया और उन में स्वदेश की भावना भरी।

सत्याग्रह में भूमिका

 गांधी जी के साथ रहते हुए ही सरोजिनी नायडू ने 1930 में नमक सत्याग्रह में अग्रणी भूमिका निभाई। और 1931 में हुए गोलमेज सम्मेलनों के दौरान सरोजिनी नायडू महात्मा गांधी के साथ में कांग्रेस के एक प्रतिनिधि के तौर पर उनके साथ में थी।

सक्रीयता

वर्ष 1932 में एक आंदोलन के दौरान जब महात्मा गांधी को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया तब उन्होंने आंदोलन की बागडोर सरोजिनी नायडू के हाथों में दी और उन्होंने उस आंदोलन को सफल बनाने में अपना पूर्ण योगदान दिया जब देश में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ किया

तब सरोजिनी नायडू भी इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रही थी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के कई बड़े नेताओं स्वतंत्रता सेनानियों को जेल हुई उनमें सरोजिनी नायडू भी शामिल थी सरोजिनी नायडू को इस दौरान पुणे की आगा खां का जेल में रखा गया था। वीरांगना सरोजिनी नायडू भारत की स्वतंत्रता तक देश हित में लगातार लड़ती रही और स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने अपना जीवन और सारा समय देश को ही समर्पित कर दिया था।

प्रथम महिला राज्यपाल

स्वतंत्रता प्राप्ति तक अपने आप को राष्ट्र सेवा में लगाए रखने वाली सरोजिनी नायडू ने स्वतंत्रता के बाद भी देश सेवा से खुद को अलग नहीं किया स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राज्यों का गठन किया गया और उन राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति की गई तब तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर सरोजिनी नायडू ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की कमान संभाली

राज्यपाल के पद पर बैठने वाली वह देश की प्रथम महिला राज्यपाल थी। एक उत्कृष्ट कवित्री स्वतंत्र महान स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ सरोजिनी नायडू ने नारी मुक्ति आंदोलन अभी भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया समाज सुधार के कार्य में भी अग्रणी थी उन्होंने नारी मुक्ति के लिए एक संस्था का गठन किया था

जिसका नाम विमेंस इंडिया एसोसिएशन था। इसका गठन उन्होंने 1917 में किया था इसके अलावा वह कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली देश की प्रथम महिला भी थी ।और सरोजनी नायडू के महान कार्यों और योगदान को देखते हुए आज हमारा देश भारत इनकी जन्म जयंती को राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाता है।

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